राजस्थान यूनिवर्सिटी में समय पर पीएचडी, एमफिल, डिलीट में एडमिशन नही होने से शोध की स्थिति और बिगड़ रही है। फाइनल ईयर की परीक्षाओं सहित अन्य एंट्रेंस एग्जाम हो रहे हैं लेकिन यूनिवर्सिटी कोरोना की आड़ में पीएचडी एडमिशन की सुध नही ले रही।
पहले भी एक सेशन जीरो घोषित हो चुका है। 2018 के पीएचडी में एडमिशन के लिए एमपेट 2019 में लिया गया था। अब 2019 सेशन की जहां जीरो होने की नौबत है वहीं 2020 के एमपेट का कोई अता पता ही नहीं है। यूनिवर्सिटी ने एमपेट कराने के लिए कन्वीनर की नियुक्ति तक नही की है।
प्रमोशन नहीं होने से हालात खराब
प्रोफेसर 8, एसोसिएट प्रो. 6 और असिस्टेंट प्रो. 4 छात्रो को पीएचडी करा सकते हैं। दूसरी ओर राजस्थान यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर मात्र 5 है। अगर 272 शिक्षकों के अटके प्रमोशन हो जाएं तो पीएचडी में सीटें बढ़ेगी। 2018 के एमपेट फेज 2 में 600 से ज्यादा सीट थी।
शोध में पिछड़े
शोध में पिछड़ने के कारण यूनिवर्सिटी में ग्रांट्स पर फर्क पड़ता है। पहले भी करीब 30 करोड़ रुपये लैप्स हो चुके हैं। जिनसे शोध कार्यों को भी धक्का लगा। यूपीई में 25 करोड़, लाइब्रेरी के लिए 5 करोड़ शामिल हैं। शोध के लिए खरीदी गई करीब 20 करोड़ की मशीने कबाड़ की तरह पड़ी है। यूपीई में तो प्लान खत्म होने के बाद भी प्रोजेक्ट पूरे नही हुए। जांच कमेटी ने पाया था कि शोध के बजाय पैसा सेमिनार, कांफ्रेंस, सैलरी पर खर्च हुआ। इसलिए ग्रांट से कटौती हुई।
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